मंगलवार, 17 सितंबर 2024

आज वो मेला देखने गई... और रात को छत पर भी आयी | Daily Diary Blog | 16 September Diary

 स्वागत है आप सभी लोगों का मेरी आज की डेली डायरी पोस्ट में, आज है 16 सितंबर 2024। मेरा आज का दिन भी पहले जैसे दिनों की तरह ही था, आज कोई खास नहीं हुआ बस शाम को या कह सकते हैं रात में एक बहुत अच्छी बात हुई जो मैं आपसे आगे शेयर करूंगा। सुबह उठने के बाद मैं किसी काम से पड़ोस के गांव गया था। जब मैं रास्ते में जा रहा था तो मैंने देखा कि सड़क में एक गड्ढा है जो आधी सड़क तक फैल चुका है और क्योंकि वह ज्यादा चौड़ा नहीं था इसलिए किसी को आसानी से दिखता नहीं था। उसकी लंबाई ज्यादा थी इसलिए नजदीक आने पर ही वह दिखाई देता था। जो आसपास के गांव वाले हैं उन्हें तो रोज आने-जाने की वजह से उसके बारे में पता था लेकिन जो बाहर से आने वाले हैं वे उससे अनजान थे। उस गड्ढे की वजह से दो मोटरसाइकिल वाले गिर गए, हालांकि किसी को ज्यादा चोट नहीं आई। उसके बाद पास ही के किसी व्यक्ति ने उस गड्ढे में मिट्टी डाल दी और उसे पाट दिया। लेकिन यहां सोचने वाली बात यह है कि वह गड्ढा कुछ दिनों के अंतराल के बाद बार-बार उभर आता है, प्रशासन उसका पक्का इलाज क्यों नहीं करवाता।

           वहां से आने के बाद मैं नहाया और नाश्ता किया। उसके बाद आदतन बाहर की ओर निकल गया और उसके घर के सामने जाकर उसे देखने की कोशिश की लेकिन आज भी वह मुझे नहीं दिखाई दी। थोड़ी देर बाद मैं वापस घर आ गया और पढ़ने बैठ गया। काफी देर पढ़ने के बाद मैं आंखें बंद करके आराम करने लगा मुझे नींद आने लगी, हालांकि इस बार मैं ज्यादा देर नहीं सोया, बहुत जल्दी उठ गया। अभी दोपहर हो चुकी थी और मम्मी ने खाने के लिए बुला लिया तो मैंने खाना खाया और खाना खाने के बाद एक बार फिर से बाहर की ओर निकल गया। लेकिन इस बार भी मुझे उसके दर्शन नहीं हुए और मैं खाली हाथ फिर से वापस आ गया। वापस आने के बाद मैंने कुछ अन्य काम निपटाए और फिर पढ़ने बैठ गया।

           लगभग 4:00 बजे तक मैं पढ़ता रहा। उसके बाद मैंने शाम की चाय पी और बाहर निकल गया। आज हमारे गांव का मेला था तो सड़क पर काफी चहल-पहल थी, छोटे बच्चे दोपहर से ही उस जगह का चक्कर लगा रहे थे जहां मेला लगता है। मैं गांव में बने सार्वजनिक स्थान पर जाकर बैठ गया। वहां बैठे-बैठे मेरी निगाह उसके घर के दरवाजे की ओर गई। मुझे उसकी आवाज तो आई लेकिन वह दिखाई नहीं दी। सौभाग्य से कुछ देर के बाद मुझे उसके दर्शन हुए… उसने दरवाजा खोला और बाहर देखा। वहां मैं बैठा हुआ था और वह कुछ देर तक देखती रही। उसके हाथ में शायद कोई थैला था। कुछ देर दरवाजे पर खड़े होने के बाद वह वापस घर के अंदर चली गई। अंदर से उसकी आवाजों से मुझे एहसास हो गया था कि वह मेला देखने जाने वाली है। थोड़ी देर के बाद वह अपनी बहनों और कुछ मेहमानों के साथ मेले की तरफ चल दी और मैं उसे तब तक देखता रहा जब तक कि वह दिखाई देना बंद नहीं हो गई। मैंने इस बात का ध्यान रखा था कि और कोई मुझे उसकी तरफ देखते हुए ना देख रहा हो।

            मैं तब तक वहीं बैठा रहा जब तक कि वह मेले से वापस नहीं आ गई। उसके वापस आने पर भी मैं उसे तब तक देखता रहा जब तक वह अपने घर के अंदर नहीं चली गई। उसके साथ और लोग होने की वजह से वह मेरी ओर नहीं देख सकती थी। अभी शाम हो चुकी थी तो मैं वहां से उठकर वापस अपने घर आ गया। मैं मेला देखने नहीं गया लेकिन मेरे पिताजी मेले से खाने-पीने का सामान घर ही ले आए थे तो मैंने घर पर ही मेले को एंजॉय कर लिया।

             आज मैंने रात का खाना नहीं खाया क्योंकि मेले से आई हुई खाने-पीने की चीजें खाने के बाद फिर मन ही नहीं किया। मैं बाहर टहलने के लिए निकल गया जैसे कि रोज खाना खाने के बाद जाता हूँ, और जाकर गांव में बने उसी स्थान पर जाकर बैठ गया। आज मेरे दोस्तों में से कोई भी नहीं आया था, पता नहीं आज सब लोग कहां रह गए। मैं अकेला ही काफी देर तक वहां बैठा रहा और जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता जा रहा था मुझे एक बार फिर से निराशा घेर रही थी क्योंकि आज भी वह छत पर नहीं आई थी। मैं आज काफी उदास था और मुझे गुस्सा भी आज बहुत ज्यादा आ रहा था, मन कर रहा था कि अभी जाकर उसे पकड़ कर लाऊं और अपने सामने बैठा दूं और उससे पूरी रात बातें करता रहूँ। मेरे वहां से घर वापस आने का समय हो चुका था और वह तब तक छत पर नहीं आई थी। मैं वापस आने ही वाला था कि मैंने सोचा… थोड़ी देर और रुक जाता हूँ, क्या पता वह आज आ ही जाए क्योंकि मेले की वजह से आज काफी देर तक घर पर मेहमानों का जमावड़ा लगा था। मैं यह सोचकर एक बार फिर से वहीं बैठ गया और मुझे थोड़ी देर ही हुई थी बैठे हुए कि वह छत पर आ गई उसे देखते ही मुझे इतनी खुशी हुई कि जैसे प्यासे को पानी मिल गया हो।

             जैसे ही वह छत पर आई मैं उसकी ओर चल दिया, वह भी वहीं टहल रही थी। मैंने उससे पूछा कि अब तक छत पर क्यों नहीं आई थी लेकिन उसने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया था। वह अपनी छत पर टहल रही थी और मैं उसे देख रहा था लेकिन दुर्भाग्यवश इस समय बाहर से उसके घर का एक सदस्य घर जा रहा था। उसे देखकर वह वहां से नीचे चली गई और तब तक रात भी काफी हो चुकी थी इसलिए अब उसके वापस छत पर आने की कोई उम्मीद नहीं थी क्योंकि अगर वह छत पर आती तो उससे पूछा जाता कि इतनी रात में छत पर क्या करने जा रही है। लेकिन फिर भी मैंने थोड़ी देर और प्रतीक्षा की, जब मुझे एहसास हो गया कि वह नहीं आएगी तो मैं वहां से घर वापस आ गया। मुझे इस बात की खुशी है कि आज वह छत पर आई और मैंने उसे देखा, उसने भी मुझे देखा। उसके ना आने पर रोज जो मुझे उदासी होती थी आज वह उदासी नहीं हुई और मुझे अब अच्छा लग रहा है। अभी रात के 11:30 बजने वाले हैं तो अब मैं चलता हूँ सोने, आपसे मुलाकात होगी कल फिर से एक और नई पोस्ट के साथ… शुभ रात्रि।

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