रविवार, 20 अक्टूबर 2024

किसी को शक ना हो इसलिए उसने दरवाजा बंद कर दिया और दूसरी ओर से आई | 19 October 2024 diary

 स्वागत है आप लोगों का मेरी दैनिक डायरी में, आज है 19 अक्टूबर 2024। आज सुबह मैं जल्दी उठा और मैंने घर के काम निपटाए क्योंकि पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है तो सारे काम मेरे ही जिम्मे हैं। काम निपटाने के बाद मैं बाहर गया और उसका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद वह अपने घर से बाहर आई और मैंने देखा उसके सर पर कूड़े की परात रखी थी। वह कूड़ा डालने जा रही थी। मैंने उसे पीछे से देखा। वह आगे चली गई। उसके बाद मैंने थोड़ी देर उसका इंतजार किया लेकिन वह नहीं लौटी। मैं घर वापस आ गया। थोड़ी देर बाद मैं फिर से बाहर गया उसी रास्ते पर जिस रास्ते से वह गई थी। मैंने जाकर देखा तो वह दोबारा अपने घर से जा रही थी। मैं उससे कुछ दूरी पर खड़ा था। जब वह उधर से लौट कर आई तो मैंने उसे देखा लेकिन वह उस रास्ते से ना जाकर उससे पहले ही मुड़ गई और अपने घर चली गई। उसने मेरी ओर नहीं देखा। मुझे उस समय थोड़ा बुरा लगा लेकिन आज मैंने मन को समझाया कि उसकी मर्जी है वह जो करे, जहां देखे, जब देखे… और मैं घर वापस आ गया।

           आज सुबह मुझे अपने खेतों पर भी जाना पड़ा। वहां काम समाप्त करके मैं घर वापस आया और नहा धोकर मैंने नाश्ता किया। आज मुझे काफी देर हो चुकी थी, लगभग 11 बज चुके थे। नाश्ता करने के बाद मैं दुकान से कुछ सामान खरीदने चला गया। जब मैं जा रहा था तो मैंने देखा कि वह घर के बाहर कुछ खरीद रही थी, हालांकि उसके साथ उसके घर की एक महिला और उसकी एक सहेली थी। मैंने उसे देखा और उसे देखते हुए मैं दुकान पर चला गया। मैं आज काफी देर तक उसके घर के पास बैठा रहा। वह मुझे उसके बाद कई बार दिखाई दी। वह एक बार अपने दरवाजे पर भी आई, उसने मुझे देखा कि मैं वहां बैठा हूँ। वह थोड़ी देर रुकी और वापस घर के अंदर चली गई। उसने दरवाजा बंद नहीं किया। वह थोड़ी देर बाद फिर से आई और देखकर लौट गई। थोड़ी देर बाद मैं उसके घर के और करीब आया तो मैंने दरवाजे में से देखा कि वह नहा चुकी है और अपने गीले कपड़े तार पर फैला रही है। उसकी निगाह मुझ पर नहीं पड़ी थी। मुझे वह बहुत अच्छी लग रही थी। जब मुझे काफी समय हो गया तो मैं घर लौट आया।

          आज मैंने दोपहर में खाना नहीं खाया था। घर आने के बाद मैं अपने काम में लग गया। थोड़ी देर बाद शाम की चाय का समय हो चुका था। अब मुझे थोड़ी सी भूख भी लगने लगी थी तो मैंने चाय ना पीकर आज उस समय खाना खाया। खाना खाकर थोड़ी देर आराम किया और उसके बाद घर के कुछ और काम निपटाए। उसके बाद मैंने शाम की चाय पी और बाहर चला गया। उसका दरवाजा बंद था। मैं वापस घर आ गया और लगभग आधा घंटे बाद फिर से बाहर गया। इस बार उसका दरवाजा खुला था। मैं एक जगह जाकर बैठ गया। मुझे उसकी आवाज सुनाई दे रही थी लेकिन वह दिखाई नहीं दी। थोड़ी देर बाद वह दरवाजे पर आई, थोड़ी देर रुकी और दरवाजा बंद कर लिया। मुझे आज उसकी बहुत ज्यादा याद आ रही थी। मैं अकेला गुमसुम सा बैठा था। मोबाइल चलाने का मन भी नहीं कर रहा था। मैं उसके दरवाजे की ओर देख रहा था। दरवाजा बंद करने के थोड़ी देर बाद वह घूम कर दूसरी ओर से आई और मुझे देखने लगी। लेकिन दुर्भाग्य से उसके आने से कुछ समय पहले ही मेरे पास एक व्यक्ति आकर बैठ गया था और जब वह आई तो उसने देखा कि मेरे पास कोई और बैठा है, फिर वह वापस चली गई। इस समय मुझे अच्छा लगा कि वह दरवाजा बंद करके दूसरी तरफ से मुझे देखने आई। तब मुझे समझ में आया कि उसने दरवाजा इसलिए बंद किया होगा ताकि उसके घर का कोई सदस्य ना देख ले कि मैं वहां अकेला बैठा हूँ और अगर वह दरवाजे पर होती तो उन्हें शक हो जाता, इसलिए उसने दरवाजा बंद किया और दूसरी तरफ से घूम कर आई। 

         थोड़ी देर बाद मैं घर वापस आ गया। किसी काम से उसके घर के पास फिर से गया। मुझे वहां खड़े हुए थोड़ी देर हुई थी कि वह अपने घर से निकल कर आई। वह किसी काम से आई थी और उसे मेरे पास तक आना पड़ा। हालांकि उसने मेरी ओर नहीं देखा क्योंकि वहां और भी कई लोग थे जिनमें उसके घर के लोग भी थे इसलिए वह जल्दी ही वापस चली गई। थोड़ी देर बाद मैं भी अपने घर वापस आ गया। रात का भोजन करने के बाद मैं रोज की तरह बाहर टहलने निकल गया। आज मैं वहां नहीं बैठा जहां मैं रोज बैठता हूँ। पता नहीं आज वह छत पर आई होगी या नहीं… मेरा मन था वहीं बैठने का क्योंकि मुझे तो वहीं अच्छा लगता है लेकिन आज मेरे साथी दूसरी जगह बैठे थे और मुझे मजबूरी में उन्हीं के पास बैठना पड़ा, हालांकि वहां से उसकी छत दिख रही थी। मैं थोड़ी-थोड़ी देर बाद देख लेता था लेकिन यह पता नहीं लग रहा था कि वह छत पर आई या नहीं। कुछ समय बाद मैं वहां से उठकर अपनी पुरानी जगह आ गया यानी कि उसके घर के पास। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। अगर वह आई होगी तो चली गई होगी और उसके बाद उसके आने का समय समाप्त हो गया था। मैं वहां थोड़ी देर बैठा और उसके बाद घर वापस आ गया।

          घर वापस आने के बाद आज मेरा मन कुछ भी करने का नहीं किया। मैंने आज कोई भी काम नहीं किया। ना ही मैं आज पढ़ा। आज पूरे दिन मेरा मन कर रहा था कि मैं उसे ही याद करता रहूं, उसके बारे में ही सोचता रहूं। कभी-कभी मन करता है कि बस उसे ही याद करता रहूं, बाकी कोई भी काम ना करुं। ऐसा ही मुझे आज लग रहा है और अभी भी मैंने कोई भी काम नहीं किया। आज मैं डायरी लिखने की भी नहीं सोच रहा था। एक बार को तो मैं सोने जाने वाला था लेकिन फिर मैंने डायरी लिखने का निश्चय किया। अभी रात के 11:00 बज चुके हैं तो अब मैं चलता हूँ सोने, आपसे मिलूंगा कल फिर से एक और नई पोस्ट के साथ… शुभ रात्रि।

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