स्वागत है आप सभी लोगों का मेरी डेली डायरी में, आज है 6 अक्टूबर 2024। आज सुबह भी मैं कुछ देरी से उठा। उठने के थोड़ी देर बाद मैंने एक गिलास पानी पिया और उसके बाद बाहर की ओर निकल गया। मैं टहल के वापस घर आ गया लेकिन वह मुझे दिखाई नहीं दी। घर आकर मैं यूं ही बैठा था। थोड़ी देर बाद मैं अपने घर के बाहर खड़ा हो गया और जैसे ही मैंने घर के बाहर कदम रखा, वह दुकान पर जा रही थी। उसे सुबह-सुबह देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ। अब मैं सोच रहा था कि मैं यही खड़ा रहूँ और उसकी प्रतीक्षा करूं या थोड़ा आगे जाकर खड़ा हो जाऊं। थोड़ा सोचने के बाद मैं आगे जाकर खड़ा हो गया क्योंकि आसपास के घरों के कुछ लोग बाहर थे तो मैं वहां से अलग हट गया। मैं ऐसी जगह खड़ा हो गया जहां से वह दुकान से वापस आते हुए मुझे मिलती। मैं वहां खड़ा था और वह दुकान से वापस आई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उसके पीछे-पीछे उसका भाई आ रहा था तो मैं उससे कोई बात नहीं कर सका, लेकिन आज मैंने उसके चेहरे पर देखा तो वह मुझे परेशान नहीं लग रही थी। उसके चेहरे पर मुझे ऐसी चिढ़ाने वाली बहुत हल्की सी हंसी नजर आई जैसे वह कह रही हो “लो अब कैसे करोगे बात, मेरा भाई आ रहा है पीछे”। मैं वहां से अलग हट गया था। वह अपने घर चली गई और फिर मैं भी अपने घर आ गया।
सभी कामों से निपट कर मैं नहाया और नाश्ता किया, उसके बाद मैं बाहर की ओर चला गया। उसके घर के सामने जाकर मैंने उसे देखने की कोशिश की लेकिन उसके घर की ओर देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वहां कोई है ही नहीं। वह कहीं भी मुझे नजर नहीं आई। मैं थोड़ी देर बाद घर वापस आ गया और पढ़ने बैठ गया। पढ़ते-पढ़ते मुझे सुस्ती आने लगी तो मैं उठकर फिर बाहर चला गया। वह मुझे अभी भी नजर नहीं आई थी। मैं घर वापस आ गया और फिर से पढ़ने बैठ गया। कुछ देर पढ़ने के बाद मैंने दूसरे काम किये। उसके बाद फिर कुछ देर पढ़ा। आज दोपहर में मैं फिर से सो गया। इस वजह से मेरा एक जरूरी काम नहीं हो पाया और उसकी मुझे बहुत ज्यादा चिंता हो रही थी। मैंने दोपहर के बाद वह काम किया जबकि मैं रोज दोपहर में ही करता हूँ। अगर मैं वह काम दोपहर में ना निपटाऊँ तो उसके बाद दूसरे कामों में मुझे देरी हो जाती है।
शाम की चाय का समय हो चुका था। मैंने चाय पी और बाहर की ओर निकल गया। बाहर जाकर मैंने उसके घर की ओर देखा तो तार पर कोई भी कपड़ा नहीं था। वह सारे कपड़े उतार कर अंदर रख चुकी थी। वह मुझे अभी भी दिखाई नहीं दी थी। उस समय मेरे मन में एक अजीब सी उदासी उतर रही थी। एक तो हम वैसे ही कम मिल पाते हैं और बहुत कम हमारी बात हो पाती है… ऊपर से इस समय यह परेशानी चल रही है। मैं इस सबसे बहुत परेशान हो चुका हूँ और कभी-कभी बहुत ज्यादा उदास हो जाता हूँ। इतना ज्यादा कि कुछ भी करने का मन नहीं करता चाहे कितना भी जरूरी काम ही क्यों ना हो। मैं वापस घर आ गया। थोड़ी देर बाद मैं किसी काम से फिर बाहर गया। मुझे ऐसा लगा जैसे वह अपने पड़ोस के घर में हो। मुझे उसकी आवाज सुनाई दी थी। मैं अपना काम कर रहा था। थोड़ी देर बाद मुझे उसकी आवाज थोड़ी तेज सुनाई दी। मैं समझ गया कि वह यहीं है। मैं उस घर की ओर ही देख रहा था। थोड़ी देर बाद वह घर के अंदर ही दरवाजे के सामने आई क्योंकि मैं जहां खड़ा था मेरे ठीक सामने उस घर का दरवाजा था। उसने मुझे देखा और दरवाजे के एक ओर से जाकर फिर दूसरी ओर से वापस चली गई। उसे पता था कि मैं यहां हूँ इसलिए वह यह देखने आई थी कि मैं कहां खड़ा हूँ और क्या कर रहा हूँ। जब मैंने उसे देखा तो मैंने सोच लिया था कि मैं काम समाप्त करके उसके पास जाऊंगा लेकिन मुझे काम में कुछ देरी हो गई और वह वहां से अपने घर चली गई।
शाम के समय मैं बाहर गया तो उसका दरवाजा बंद था। मैं वहां बैठा रहा लेकिन उसका दरवाजा नहीं खुला। थोड़ी देर बाद मेरे अन्य साथी भी आ गए। हम वहां बातें करते रहे। रात होने पर मैं उठकर घर आ गया। मैंने घर आकर घर का कुछ काम किया और थोड़ी देर के लिए फिर से बाहर गया। उसके घर के सामने जाकर मैंने देखा कि वह रसोई में काम कर रही है। बाहर से उसकी रसोई साफ दिखती है और क्योंकि रसोई में लाइट जलती है इसलिए वहां जो भी होता है खिड़की में से दिख जाता है। उसे देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है चाहे वह इसी तरह क्यों ना दिखाई दे। वह रसोई में होती है तो उसकी पहचान तो पड़ जाती है कि यह वही है लेकिन उतनी अच्छी तरह से दिखाई नहीं देती। मैं थोड़ी देर बाद घर वापस आ गया।
रात का खाना खाने के बाद मैं फिर से टहलने के लिए बाहर चला गया। शाम से मेरा मन बिल्कुल भी ठीक नहीं था। मुझे बार-बार उसकी याद आ रही थी। कैसे भी करके अब मुझे उससे बात करनी है और मिलना है। अब मुझे भी लग रहा है कि उसे भी कोई परेशानी नहीं है लेकिन मुझे उसके ऊपर थोड़ा सा गुस्सा भी आ रहा है। मैं टहल रहा था लेकिन मन में उसी के विचार चल रहे थे। उसकी छत पर कोई नहीं था और उसका दरवाजा भी बंद था। थोड़ी देर टहलने के बाद मैं बैठ गया और मोबाइल में कुछ काम करने लगा और बार-बार उसकी छत की ओर देखता कि काश वह आ जाए या दरवाजा खोलकर ही मुझे देख ले, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मैं बैठा रहा और उसकी प्रतीक्षा करता रहा। जब रात काफी होने लगी तो मैं उठकर अपने घर आ गया। आज घर आने के बाद भी मेरा कोई भी काम करने का मन नहीं था तो आज मैंने कुछ भी नहीं किया। अभी रात के 11:30 बज चुके हैं तो अब मैं चलता हूँ सोने, आपसे मिलूंगा कल फिर से एक और नई पोस्ट के साथ… शुभ रात्रि।
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