बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

सुबह से शाम...और शाम से रात... सारा दिन ऐसे ही गुजर जाता है उसकी आस में | 8 October 2024 Diary

 स्वागत है आप लोगों का मेरी डेली डायरी में, आज है 8 अक्टूबर 2024। आज सुबह भी मैं थोड़ी देरी से सो कर उठा। उठने के कुछ देर बाद मैंने एक गिलास पानी पिया और बाहर निकल गया। जब मैं उसके घर के सामने था तो वह अपने घर से निकलकर आ रही थी। मैंने उसे आते हुए थोड़ी देर देखा और आगे बढ़ गया। वह अपने घर से निकल कर पड़ोस में अपने चाचा जी के घर जा रही थी। मैं तुरंत वहां से थोड़ा आगे जाकर वापस हो गया और जब तक मैं आया वह अपने चाचा जी के घर के अंदर जा चुकी थी, लेकिन मुझे दरवाजे में से दिख रही थी। मैं वहां रुक नहीं सकता था तो मैं वापस घर आ गया। घर आकर नित्य-कर्म से निपट कर मैं नहाया और नाश्ता किया, उसके बाद फिर से बाहर चला गया और जब इस बार मैं उसके घर के सामने पहुंचा तो वह मुझे अपने घर में ही दरवाजे के अंदर खड़ी दिखाई दी। इस बार वह नहा चुकी थी क्योंकि वह दूसरे कपड़े पहने हुए थी। उसकी नजर मेरी ओर नहीं थी। मैंने उसे देखा, आज मुझे वह बहुत अच्छी लग रही थी। थोड़ी देर उसे निहारने के बाद मैं आगे बढ़ गया। थोड़ी देर बाद जब लौटा तो वह वहां नहीं थी, घर के अंदर जा चुकी थी।

             घर आने के बाद मैंने थोड़ी देर पढ़ाई की और उसके बाद घर के दूसरे काम पूरे किए। दोपहर का भोजन करने के बाद मैं फिर से बाहर गया लेकिन वह मुझे दिखाई नहीं दी थी। इस समय उसके दिखाई देने की कोई उम्मीद भी नहीं थी क्योंकि दोपहर का समय था और वह घर के अंदर होगी। बाहर धूप तेज थी, मैं भी थोड़ी देर बाद वापस आ गया। आज मैं दोपहर में एक बार फिर से सो गया और दोपहर में मुझे जो काम करना था, वह मैं नहीं कर पाया। मुझे उसमें फिर से देरी हुई और दोपहर के बाद मैंने वह काम किया। शाम की चाय पीने के बाद मैं बाहर गया लेकिन वह मुझे अभी भी नहीं दिखी थी, तो मैं फिर से घर वापस आ गया। घर आकर मैं पढ़ने बैठ गया। लगभग 1 घंटा पढ़ा, उसके बाद मेरा पढ़ने का मन नहीं किया। मैं उठा और धीरे-धीरे शाम हो रही थी तो मैं बाहर चला गया। जैसे ही मैं उसके घर के सामने पहुंचा वह मुझे घर के बाहर कुछ काम करते हुए दिखाई दी। मुझसे पहले ही उसने मुझे देख लिया था और जैसे ही मैंने उसे देखा उस समय वह मेरी ओर देखकर अपनी नजर दूसरी ओर घुमा रही थी क्योंकि सामने ही उसके घर का एक सदस्य था। मैं उस समय थोड़ा उदास सा था। शायद उसे उदासी मेरे चेहरे पर दिखी हो क्योंकि पिछले दो दिनों से वह मुझे ठीक से नहीं मिल पाई है।

            बाहर जाने के बाद मैं अपने नियत स्थान पर बैठ गया। उसका दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था लेकिन वह मुझे दरवाजे में से नहीं दिखी। मैं वहीं बैठा मोबाइल में कुछ काम कर रहा था तभी कुछ और लोग वहां आ गए। हम लोगों ने वहां बैठकर बातें कीं और जब रात हो गई तो अपने-अपने घर वापस आ गए। रात का भोजन लेने के बाद एक बार फिर से मैं बाहर टहलने निकल गया। आज शाम के समय से ही मुझे अपने अंदर उदासी साफ महसूस हो रही थी। यह एक कसक थी… उसे ना देख पाने की… उससे बात ना कर पाने की… और उससे ना मिल पाने की… जब सुबह होती है तो उसे देखने की आस रहती है। धीरे-धीरे दिन निकलता जाता है और शाम हो जाती है। शाम को उसे देखने का बहुत मन होता है लेकिन जब वह शाम को भी नहीं दिखाई देती या उससे कोई बात नहीं हो पाती तो मन में उदासी बढ़ जाती है क्योंकि शाम के बाद रात हो जाती है और रात को तो दिखने का सवाल ही पैदा नहीं होता… और छत पर वह कुछ दिनों से आ नहीं रही है। आज मैं और मेरे साथी गांव से बाहर टहलने निकल गए थे। वहां से लौट कर आने के बाद हम कुछ देर वहां बैठे और उसके बाद घर आ गए। घर आने के बाद मैंने अपने बचे हुए काम किये और उसके बाद डायरी लिखने बैठ गया। अभी रात के 11:15 बजने वाले हैं। अब मैं चलता हूँ सोने, आपसे मिलूंगा कल फिर से एक और नई पोस्ट के साथ… शुभ रात्रि।


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